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मुंबई10 मिनट पहले
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महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार हलचल पैदा हो गई है। खबर है कि एनसीपी के दोनों गुटों को विलय कर एनडीए में शामिल होने का प्रस्ताव मिला है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, केंद्र सरकार संसद में इस बार महिला आरक्षण विधेयक और परिसीमन विधेयक से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक लाने वाली है।
इसीलिए एनडीए के पार्टी नेतृत्व ने सुझाव दिया है कि नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (NCP) के दोनों गुट आपस में फिर से मिल जाएं और एनडीए की सहयोगी पार्टी बन जाएं। बजाय इसके कि कोई भी दल सत्ताधारी पार्टी में विलय करे।
ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं कि NCP (SP) (नेशनल कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार) कुछ शर्तों के तहत परिसीमन विधेयक के प्रति अपने समर्थन पर पुनर्विचार कर सकती है। पार्टी का यही नरम रुख एनडीए से गठबंधन का संकेत हो सकता है। भाजपा इस मानसून सत्र से पहले सदन में अपनी संख्या बल बढ़ाने की कोशिश में लगी हुई है।
दोनों गुटों को कैबिनेट में पद देने का प्रस्ताव
सूत्रों के मुताबिक, भाजपा नेतृत्व ने NCP के दोनों गुटों (सुनेत्रा पवार गुट और शरद पवार गुट) के बीच सत्ता का संतुलन बनाने के लिए केंद्रीय कैबिनेट में दो पद देने का प्रस्ताव दिया है, बशर्ते वे दोनों एक पार्टी के तौर पर विलय करने के लिए सहमत हों।

हाल ही में NCP के प्रफुल्ल पटेल और सुनील तटकरे की मुंबई में CM देवेंद्र फडणवीस के घर पर मुलाकात हुई थी।
एनसीपी में ही फूट की चर्चा
एनसीपी पार्टी के सूत्रों की मानें तो, भाजपा का शीर्ष नेतृत्व की महाराष्ट्र की उपमुख्यमंत्री सुनेत्रा पवार और उनके नेताओं से शुरुआती बातचीत हो चुकी है, लेकिन योजना ने अभी तक अंतिम रूप नहीं लिया है। सबकुछ एनसीपी में सुनेत्रा पवार और वरिष्ठ नेताओं के बीच चल रही खींचतान पर निर्भर करता है।
वहीं, सुनेत्रा के बड़े बेटे और राज्यसभा सांसद पार्थ पवार की इच्छा है कि अगर विलय होता है कि तो सुनेत्रा पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनें। साथ ही उनकी मां राज्य सरकार में वित्त विभाग संभालें, जो पहले उनके पिता अजित पवार के पास था। हालांकि जनवरी में उनके निधन के बाद यह मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस के पास चला गया।
हालांकि, इस मामले में एनसीपी में ही फूट नजर आ रही है, क्योंकि, पार्टी के अध्यक्ष सुनील तटकरे, कार्यकारी अध्यक्ष प्रफुल्ल पटेल और छगन भुजबल जैसे वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि सत्ता का बंटवारा सभी को ध्यान में रखते हुए हो। इनका कहना है कि अगर वे (सुनेत्रा गुट) कैबिनेट पोर्टफोलियो, राज्य वित्त मंत्रालय और राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद लेने पर अड़े रहते हैं, तो दिक्कतें होंगी, क्योंकि दूसरी तरफ शरद पवार की (NCP-SP) के इसके लिए सहमत होने की संभावना कम हो जाएगी।
मुंबई में 8 जुलाई को शरद पवार और महाराष्ट्र के डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे की मुलाकात हुई थी।
शरद गुट की भाजपा-कांग्रेस दोनों से बातचीत
उधर महाराष्ट्र में NCP (शरद गुट) पार्टी कांग्रेस और भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए दोनों से बातचीत को तैयार है। सूत्रों के मुताबिक, NCP (SP) के 8 लोकसभा सांसद और 10 विधायक पार्टी के भविष्य को लेकर दो धड़ों में बंटे हुए हैं।
दावा है कि कुछ सांसद और विधायक NDA में शामिल होने के पक्ष में हैं, जबकि कुछ कांग्रेस के साथ विलय चाहते हैं। शरद पवार कांग्रेस में विलय के लिए तभी तैयार होंगे, जब सुप्रिया सुले को पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिले। इसमें महाराष्ट्र कांग्रेस अध्यक्ष पद पर पवार समर्थक, सुप्रिया सुले को कांग्रेस का उपाध्यक्ष बनाने और कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) में पर्याप्त प्रतिनिधित्व जैसी मांगें शामिल बताई गई हैं।
दूसरी ओर, एक अन्य सूत्र का दावा है कि पार्टी का एक प्रभावशाली धड़ा भाजपा और NDA के साथ जाने का समर्थक है। बातचीत में सुप्रिया सुले के लिए केंद्रीय मंत्री पद और पवार समर्थकों के लिए दो मंत्री पद की चर्चा भी होने का दावा किया गया है। हालांकि, इस पर किसी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

कांग्रेस से अलग होकर बनाई थी NCP
राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) की स्थापना 10 जून 1999 को शरद पवार, पीए संगमा और तारिक अनवर ने की थी। तीनों नेताओं ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाते हुए पार्टी नेतृत्व पर सवाल खड़े किए थे। कांग्रेस ने उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया। इसके बाद तीनों ने NCP का गठन किया।

क्या है संख्या बल का गणित?
एनसीपी के एनडीए में शामिल होने से मोदी सरकार संसद में दो तिहाई बहुमत के और करीब आ जाएगी, जो संविधान संशोधन विधेयक पास करने के लिए अहम है। सरकार महिला आरक्षण कानून लागू करने और परिसीमन विधेयक के जरिए संसद और राज्य विधानसभाओं की संख्या बढ़ाने वाले संविधान संशोधन विधेयक पास कराने के लिए जरूरी संख्या जुटानी की कोशिश कर रही है। अप्रैल में राज्यसभा के विशेष सत्र में सरकार की यह कोशिशें नाकाम हो गई थीं।
इसके बाद से विपक्ष की चार पार्टियों के 37 लोकसभा और राज्यसभा सांसद सत्ता पक्ष में शामिल हो चुके हैं। 1985 में दलबदल विरोधी कानून लागू होने के बाद से संसद में विपक्ष से सत्ता में शामिल होने वाले सांसदों का यह सबसे बड़ा बदलाव है।
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