राज शर्मा | काठमांडू45 मिनट पहले
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नेपाल में भ्रष्टाचार खत्म करने और सुशासन की मांग को लेकर 8-9 सितंबर 2025 को हुए Gen-Z आंदोलन को एक साल पूरा हो गया है। आंदोलन के बाद सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी थी।
इसके बाद बालेन के नेतृत्व वाली सरकार को भी 6 महीने हो चुके हैं। इसके बावजूद आंदोलन के दौरान उठाए गए कई मुद्दे अब तक अधूरे हैं। Gen-Z युवाओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मुकदमे भी वापस नहीं लिए गए हैं।
संविधान और शासन व्यवस्था में बदलाव, निर्वाचन प्रणाली में सुधार, Gen-Z युवा परिषद का गठन, आंदोलन के दौरान दमन करने वालों पर कार्रवाई, शहीद परिवारों को राहत, रोजगार और भ्रष्टाचार खत्म करने जैसे मुद्दों पर सरकार की गंभीरता को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

सितंबर 2025 में हुए Gen-Z आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने काठमांडू में संसद भवन में आग लगा दी थी।
शरीर में अब भी छर्रे, इलाज का खर्च खुद उठा रहे
आंदोलन के दौरान घायल हुए लोगों को अब तक पर्याप्त इलाज नहीं मिल सका है। Gen-Z आंदोलन में सक्रिय अर्जुन चुंदाली के मुताबिक, कुछ घायल अपने खर्च पर भारत जाकर इलाज करा रहे हैं। कई लोगों के शरीर में अब भी गोलियों के छर्रे हैं।
Gen-Z आंदोलन में दो दिनों के दौरान 77 लोगों की मौत हुई थी और 2,429 लोग घायल हुए थे। आंदोलन से करीब 84 अरब 45 करोड़ रुपए के बराबर आर्थिक नुकसान का अनुमान है। पहले दिन संसद भवन के सामने 20 से ज्यादा छात्रों की मौत हुई थी।

नेपाल पुलिस ने आंदोलनकारी युवाओं पर फायरिंग की थी, जिसमें दर्जनों लोगों की मौत हो गई थी।
गृहमंत्री बोले- मांगें पूरी करने में जुटे हैं
आंदोलन के अगुआ रहे सुदन गुरुंग अब नेपाल के गृहमंत्री हैं। उन्होंने कहा, “हमने जो कसम खाई है, उसे पूरा करना है। कई काम बाकी हैं, लेकिन हम जुटे हुए हैं।”
Gen-Z आंदोलन शहीद परिवार के अध्यक्ष नारायण श्रेष्ठ ने कहा कि आंदोलन के दौरान युवाओं पर अत्याचार करने वाले दोषियों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि शहीद और घायल परिवारों की शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की पूरी जिम्मेदारी राज्य को लेनी चाहिए।
भास्कर एक्सपर्ट: नए लोगों को जनमत दिलाने तक सीमित रहा आंदोलन
राजनीतिक विश्लेषक प्रो. डॉ. बासुदेव खनाल के मुताबिक, Gen-Z आंदोलन पुराने राजनीतिक दलों के प्रति आक्रोश पैदा करने और नए लोगों के पक्ष में जनमत बनाने तक सीमित रह गया।
उनका कहना है कि Gen-Z युवा कानून के शासन के लिए लड़े थे, लेकिन आज भी देश कानून और नीति के बजाय आदेश और अध्यादेश से चलाया जा रहा है। इससे यह संदेश मिलता है कि असंगठित आंदोलन से नुकसान तो ज्यादा हो सकता है, लेकिन ठोस परिणाम हासिल करना मुश्किल है।
कई मोर्चों पर सरकार की रफ्तार धीमी
बहुदलीय शासन व्यवस्था की वापसी के बाद पदाधिकारियों की संपत्ति जांच के लिए बना आयोग भी अब तक काम शुरू नहीं कर सका है। सरकारी नियुक्तियों में नेताओं के करीबियों को तरजीह देने के आरोप भी लग रहे हैं।
सरकारी तंत्र में डर का माहौल है। बड़े पदों से लगातार इस्तीफे हो रहे हैं, जिसे लेकर भी चिंता बढ़ रही है।
आर्थिक मोर्चे पर भी हालात बेहतर नहीं हैं। बैंकों में निवेश के लिए पैसा मौजूद है, लेकिन निवेशक पैसा लगाने को तैयार नहीं हैं। विदेशी निवेश भी घटा है।
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