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लॉर्ड्स की 'क्वीन' बनीं वडोदरा की यास्तिका:शतक के बाद बोलीं- पापा, बैट उठाया तो आप सब सामने दिख रहे थे; ऐतिहासिक पारी के पीछे की कहानी




लॉर्ड्स के 142 साल के इतिहास में खेले गए पहले महिला टेस्ट में भारत की जीत की हीरो रहीं विकेटकीपर-बल्लेबाज यास्तिका भाटिया के लिए यह शतक सिर्फ एक रिकॉर्ड नहीं, बल्कि पूरे परिवार का सपना पूरा होने जैसा था। तीसरी पारी में 158 गेंद पर 113 रन की पारी खेलने के बाद जब यास्तिका ने बैट उठाकर जश्न मनाया तो उनकी आंखों के सामने माता-पिता, बहन और दिवंगत दादाजी की तस्वीर थी। मैच के बाद उन्होंने पिता से फोन पर कहा, ‘पापा, जब मैंने बैट उठाया तो मुझे आप चारों और दादाजी दिख रहे थे, ऐसा लगा जैसे वे मुझे आशीर्वाद दे रहे हों।’ यास्तिका के पिता हरीश भाटिया ने दैनिक भास्कर से बातचीत में बताया कि जब बेटी 91 रन पर थी और लंच ब्रेक हुआ, तब वे मंदिर पहुंचे और भगवान से सिर्फ एक ही प्रार्थना की-‘भगवान, आज इसकी सेंचुरी पूरी करवा देना।” उनका कहना है कि चोट से वापसी के बाद यह शतक यास्तिका के आत्मविश्वास के लिए बेहद जरूरी था। जैसे ही वह 99 रन पर पहुंची, पूरे परिवार की धड़कनें तेज हो गईं और शतक पूरा होते ही सभी की आंखों से खुशी के आंसू निकल पड़े। वडोदरा के पोलो ग्राउंड से लॉर्ड्स तक का सफर यास्तिका ने क्रिकेट की शुरुआत वडोदरा के पोलो ग्राउंड स्थित यूथ सर्विस सेंटर से की थी। शानदार प्रदर्शन के दम पर पहले बड़ौदा अंडर-19 और फिर सीनियर टीम में जगह बनाई। 2021 में भारतीय टीम में चयन हुआ और 2022 के ऑस्ट्रेलिया दौरे पर उन्होंने टेस्ट, वनडे और टी-20- तीनों फॉर्मेट में डेब्यू किया। पढ़ाई में भी रहीं अव्वल, 10 साल से नहीं खाई चीनी यास्तिका रोज करीब तीन घंटे बल्लेबाजी और विकेटकीपिंग की प्रैक्टिस करती थीं। क्रिकेट के साथ पढ़ाई में भी हमेशा टॉप-3 में रहीं और 12वीं साइंस में 90% अंक हासिल किए। वह पिछले 10 साल से चीनी नहीं खातीं। मिठाइयों से दूर रहती हैं और डाइट में फल, ड्राई फ्रूट्स, नियमित जिम और रनिंग शामिल है। बैडमिंटन और कराटे से क्रिकेट तक का सफर बचपन से ही खेलों में रुचि रखने वाली यास्तिका ने छह साल की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू किया और जिला स्तर तक खेलीं। इसके बाद कराटे में ब्लैक बेल्ट हासिल की। फिर क्रिकेट को करियर बनाया और शुरू से ही भारत के लिए खेलने का सपना देखा। 12 साल की उम्र में मिला पहला बड़ा मौका यास्तिका के पिता बताते हैं कि आठ साल की उम्र में उन्होंने क्रिकेट शुरू किया, लेकिन 12 साल की उम्र में दिल्ली में टी-20 टूर्नामेंट के लिए चयन के बाद उन्होंने इसे गंभीरता से लिया। उस समय उनकी कोच पूर्णिमा राव ने कहा था, ‘यह लड़की एक दिन भारत के लिए जरूर खेलेगी।’ बाद में कोच गीता गायकवाड़ ने भी यही भरोसा जताया था। सुबह 5 बजे से शुरू होती थी तैयारी यास्तिका रोज सुबह पांच बजे उठकर रनिंग के लिए जाती थीं। स्कूल से लौटने के बाद दोबारा शाम तक अभ्यास करतीं। बड़े होने पर जिम ट्रेनिंग भी शुरू हुई। पिता के मुताबिक, बाद में प्रोफेशनल ट्रेनिंग और कोच किरण के मार्गदर्शन ने उनके खेल को नया आयाम दिया। हार्दिक, क्रुणाल और ईशान से भी मिली सीख रिलायंस क्रिकेट स्टेडियम में अभ्यास के दौरान यास्तिका की मुलाकात हार्दिक पंड्या, क्रुणाल पंड्या और ईशान किशन से हुई थी। तीनों खिलाड़ियों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की तैयारी और मानसिकता को लेकर कई अहम सुझाव दिए। मां बोलीं- 90 रन के बाद हर गेंद पर दिल की धड़कन बढ़ रही थी यास्तिका की मां गरिमा भाटिया ने बताया कि बेटी के 90 रन पार करते ही पूरा परिवार तनाव में था। सभी भगवान से प्रार्थना कर रहे थे कि किसी तरह शतक पूरा हो जाए। जैसे ही सेंचुरी बनी, पूरा परिवार खुशी से झूम उठा और सभी की आंखों में आंसू आ गए। चोट, ऑपरेशन और फिर शानदार वापसी गरिमा ने बताया कि बार-बार लगी चोटों ने यास्तिका का सफर आसान नहीं रहने दिया। चोट के कारण वह घरेलू वर्ल्ड कप भी नहीं खेल सकीं और ऑपरेशन कराना पड़ा। इसके बाद उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से फिर से शुरुआत करनी पड़ी। लेकिन मैदान पर वापसी की उनकी जिद और मेहनत ने आखिरकार उन्हें लॉर्ड्स में ऐतिहासिक शतक तक पहुंचा दिया।



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