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हूती विद्रोहियों की पसंदीदा गाड़ी बनी टोयोटा हिलक्स:इस पर मशीनगन-रॉकेट लॉन्चर लगाना आसान, 45 साल से दुनियाभर के आतंकियों की पहचान बनी




यमन के लाल सागर तट पर पिछले हफ्ते हूती लड़ाकों के बड़े काफिले में बड़ी संख्या में टोयोटा हिलक्स पिकअप नजर आईं। कई गाड़ियों पर मशीनगन और रॉकेट लॉन्चर लगे थे। हिलक्स का युद्ध में इस्तेमाल नया नहीं है। करीब 45 साल से यह गाड़ी दुनिया के अलग-अलग संघर्षों में विद्रोहियों, गुरिल्लाओं और दूसरे सशस्त्र गुटों के बीच नजर आती रही है। इराक में आईएस से लेकर यमन के हूतियों और अफ्रीका के सशस्त्र गुटों तक, कई संगठनों ने टोयोटा की पिकअप का इस्तेमाल किया है।
आतंकियों को टोयाटा हिलक्स इतनी पसंद क्यों है? टोयोटा हिलक्स के लड़ाकों और आतंकी संगठनों के बीच इस्तेमाल होने की एक बड़ी वजह इसकी मजबूती और खराब रास्तों पर आसानी से चलने की क्षमता है। यह गाड़ी ऐसे इलाकों में भी चल सकती है, जहां सामान्य गाड़ियों के लिए पहुंचना मुश्किल होता है। खासकर रेगिस्तान और ऊबड़-खाबड़ रास्तों में यह ज्यादा कामयाब है। BBC के कार्यक्रम ‘टॉप गियर’ में भी हिलक्स की मजबूती को परखने के लिए एक प्रयोग किया गया था। इसमें गाड़ी को पेड़ से टकराया गया, कई घंटे समुद्र के पानी में डुबोया गया, ऊंचाई से गिराया गया और भारी वजन के नीचे दबाया गया। इसके अलावा उसे इमारत से टकराया गया, उस पर भारी चीजें गिराई गईं और उसमें आग भी लगाई गई। इन सबके बाद भी गाड़ी को दोबारा चलाया जा सका। पिकअप में हथियार लगाकर बना देते हैं ‘टेक्निकल’ टोयोटा हिलक्स जैसी पिकअप गाड़ियों की एक और खासियत है कि इनके पीछे के खुले हिस्से में हथियार लगाए जा सकते हैं। इस तरह बदली गई गाड़ियों को आम तौर पर ‘टेक्निकल’ कहा जाता है। ‘टेक्निकल’ का इस्तेमाल सबसे पहले किसी एक आतंकी संगठन ने शुरू नहीं किया था। इस तरह की गाड़ियां अलग-अलग युद्धों और संघर्षों में लंबे समय से इस्तेमाल होती रही हैं। इनमें पिकअप गाड़ी के पीछे हथियार लगाए जाते हैं, जिससे वह लड़ाई में इस्तेमाल होने वाली तेज और आसानी से घूमने वाली गाड़ी बन जाती है। 1987 के ‘टोयोटा वॉर’ में दिखी इन गाड़ियों की ताकत टोयोटा की पिकअप गाड़ियों की उपयोगिता का सबसे चर्चित उदाहरण 1987 का चाड-लीबिया युद्ध है। इस संघर्ष को बाद में ‘टोयोटा वॉर’ यानी ‘टोयोटा युद्ध’ के नाम से भी जाना गया। उस समय लीबिया के पास रूस का समर्थन था। उसके पास टैंक, लड़ाकू विमान और हेलिकॉप्टर जैसी भारी सैन्य ताकत थी। इसके मुकाबले चाड की सेना के पास करीब 400 टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर जैसी पिकअप गाड़ियां थीं। चाड के लड़ाकों के पास कुछ एंटी-एयरक्राफ्ट और एंटी-टैंक मिसाइलें भी थीं। चाड के पास लीबिया की तरह भारी टैंक और बड़ी संख्या में लड़ाकू विमान नहीं थे। लेकिन उसकी पिकअप गाड़ियां हल्की और तेज थीं। वे सहारा के रेगिस्तान में तेजी से चल सकती थीं और जरूरत पड़ने पर अचानक अपनी दिशा बदल सकती थीं। इसका फायदा चाड की सेना को मिला। वह इन गाड़ियों की मदद से तेजी से एक जगह से दूसरी जगह पहुंचती रही और लीबिया की भारी सैन्य ताकत का सामना करती रही। आखिरकार चाड ने इस संघर्ष में जीत हासिल की। इस युद्ध ने दिखाया कि किसी लड़ाई में सिर्फ भारी हथियार और बड़े टैंक ही निर्णायक नहीं होते। तेज, मजबूत और खराब रास्तों पर आसानी से चलने वाली गाड़ियां भी युद्ध में बड़ा फायदा दे सकती हैं। अफ्रीका से पश्चिम एशिया तक, लड़ाकों की पसंद बनी हिलक्स ‘टोयोटा वॉर’ के बाद दूसरे लड़ाकू समूहों ने भी ऐसी पिकअप गाड़ियों की उपयोगिता को समझा। धीरे-धीरे टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर जैसी गाड़ियां अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कई संघर्षग्रस्त इलाकों में दिखाई देने लगीं। इनकी मजबूती, लंबी दूरी तक चलने की क्षमता और खराब रास्तों पर आसानी से चल पाने की वजह से ये गाड़ियां युद्धग्रस्त इलाकों में खास तौर पर उपयोगी साबित हुईं। यही वजह है कि तालिबान, अल-कायदा और बाद में आईएसआईएस जैसे संगठनों की तस्वीरों और वीडियो में भी टोयोटा की पिकअप गाड़ियां अक्सर दिखाई देती रही हैं। इस तरह टोयोटा हिलक्स और लैंड क्रूजर सिर्फ आम इस्तेमाल की गाड़ियां नहीं रहीं, बल्कि कई युद्धग्रस्त इलाकों में लड़ाकों के बीच भी उनकी अलग पहचान बन गई।



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