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India Commonwealth Games Gold Medal History


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21 मिनट पहले

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14 अक्टूबर 2010…

दिल्ली का जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम ‘भारत…भारत…’ के नारों से गूंज रहा था। बैडमिंटन कोर्ट पर सायना नेहवाल थीं। सामने सिर्फ एक फाइनल नहीं था, बल्कि पदक तालिका में भारत का भविष्य भी था।

अगर सायना हार जातीं, तो मेजबान भारत तीसरे स्थान पर खिसक जाता, लेकिन उन्होंने जीत दर्ज की। भारत का 38वां स्वर्ण पदक आया। कुल पदक 101 हुए और पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में ऑस्ट्रेलिया के बाद भारत दूसरे स्थान पर पहुंच गया। आज भी यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

भारत की यह कहानी 2010 में शुरू नहीं हुई थी, इसकी शुरुआत 76 साल पहले हुई थी, जब 1934 में सिर्फ छह भारतीय खिलाड़ी पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स में उतरे थे। उस वक्त भारत पर अंग्रेजों का शासन था, लेकिन पहलवान राशिद अनवर ने कांस्य पदक जीतकर भारत का नाम इतिहास में दर्ज करा दिया।

हालांकि, कॉमनवेल्थ गेम्स की कहानी इससे भी 43 साल पहले की है। आइए, 135 साल पुराने इस सफर के बारे में जानते हैं….

सायना नेहवाल ने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला एकल का स्वर्ण जीतकर भारत को पदक तालिका में ऐतिहासिक दूसरा स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

सायना नेहवाल ने 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स में महिला एकल का स्वर्ण जीतकर भारत को पदक तालिका में ऐतिहासिक दूसरा स्थान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

न सरकार, न राजा… एक पादरी का आइडिया

कॉमनवेल्थ की कहानी शुरू होती है 1891 में। ब्रिटिश साम्राज्य अपने चरम पर था। दुनिया की करीब एक-चौथाई आबादी और विशाल भूभाग पर ब्रिटेन का शासन था। तब एक ब्रिटिश पादरी जॉन एस्टली कूपर ने एक ऐसा सपना देखा, जिसने बाद में दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में से एक को जन्म दिया।

उन्होंने कहा कि साम्राज्य की ताकत सिर्फ सेना से नहीं, बल्कि लोगों के रिश्तों से भी बढ़ती है। अगर ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग देशों के खिलाड़ी एक मैदान पर उतरेंगे तो आपसी भरोसा और भाईचारा मजबूत होगा।

उन्होंने इसका नाम दिया- ‘पैन-ब्रिटेनिक फेस्टिवल’, लेकिन विचार देना आसान था, उसे सच करना मुश्किल। करीब 20 साल तक यह सपना कागजों में ही पड़ा रहा।

राजा के राज्याभिषेक ने दिखाया भविष्य

1911 में ब्रिटेन के राजा जॉर्ज पंचम का राज्याभिषेक हुआ। इसी मौके पर लंदन में फेस्टिवल ऑफ एम्पायर आयोजित किया गया।

ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के खिलाड़ी पहली बार एक ही आयोजन में उतरे। यह आधिकारिक कॉमनवेल्थ गेम्स नहीं थे, लेकिन इतिहासकार इसे कॉमनवेल्थ गेम्स की पहली झलक मानते हैं। यहीं लोगों को एहसास हुआ कि ऐसा आयोजन सफल हो सकता है।

1911 में लंदन के क्रिस्टल पैलेस में आयोजित 'फेस्टिवल ऑफ एम्पायर' में ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग देशों के लोग पहुंचे थे।

1911 में लंदन के क्रिस्टल पैलेस में आयोजित ‘फेस्टिवल ऑफ एम्पायर’ में ब्रिटिश साम्राज्य के अलग-अलग देशों के लोग पहुंचे थे।

ओलिंपिक में हुई एक बैठक… जिसने इतिहास बदल दिया

1928 के एम्स्टर्डम ओलिंपिक के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य के खेल प्रशासक मिले। यहीं फैसला हुआ कि ओलिंपिक से अलग, हर चार साल में ब्रिटिश साम्राज्य के देशों के लिए अपना एक खेल आयोजन होगा। यही वह फैसला था जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स को जन्म दिया।

पहले गेम्स लगभग रद्द होने की कगार पर थे

16 अगस्त 1930… कनाडा के छोटे से शहर हैमिल्टन में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स शुरू होने वाले थे। लेकिन एक बड़ी समस्या सामने थी। उस समय हवाई यात्रा आम नहीं थी। ज्यादातर खिलाड़ी समुद्री जहाजों से कनाडा पहुंचते थे। कई देशों ने साफ कह दिया कि उनके पास यात्रा का खर्च नहीं है।

आयोजकों ने कई टीमों की आर्थिक मदद की। तब जाकर पहला आयोजन हो सका। अगर उस समय कनाडा पीछे हट जाता, तो शायद कॉमनवेल्थ गेम्स का इतिहास वहीं खत्म हो जाता।

आज हजारों खिलाड़ी आते हैं… तब सिर्फ 400 थे

पहले संस्करण में केवल 11 देशों के करीब 400 खिलाड़ी। इसमें सिर्फ 6 खेल- एथलेटिक्स, बॉक्सिंग, स्विमिंग, डाइविंग, कुश्ती और लॉन बॉल्स शामिल थे। आज इन खेलों में हजारों खिलाड़ी हिस्सा लेते हैं और दर्जनों खेल खेले जाते हैं।

कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास का पहला स्वर्ण पदक ऑस्ट्रेलिया के रोवर बॉबी पियर्स ने जीता। वे बाद में ओलिंपिक चैंपियन भी बने।

हैमिल्टन में 1930 में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स आयोजित किए गए थे। इसमें केवल 11 देश, करीब 400 खिलाड़ी, सिर्फ 6 खेल शामिल थे।

हैमिल्टन में 1930 में पहले ब्रिटिश एम्पायर गेम्स आयोजित किए गए थे। इसमें केवल 11 देश, करीब 400 खिलाड़ी, सिर्फ 6 खेल शामिल थे।

1934 में भारत गुलाम था, लेकिन इतिहास लिखा

भारत पहली बार इन खेलों में उतरा। आजाद भारत नहीं… ब्रिटिश भारत। पूरे दल में सिर्फ छह खिलाड़ी थे। उनमें से पहलवान राशिद अनवर ने कांस्य पदक जीतकर भारत का खाता खोला। यानी भारत का पहला कॉमनवेल्थ पदक उस समय आया, जब देश का अपना तिरंगा भी आधिकारिक राष्ट्रीय ध्वज नहीं था।

पहलवान राशिद अनवर भारत के लिए पहला कॉमनवेल्थ मेडल जीतने वाले खिलाड़ी थे।

पहलवान राशिद अनवर भारत के लिए पहला कॉमनवेल्थ मेडल जीतने वाले खिलाड़ी थे।

फिर आया ऐसा युद्ध, जिसने खेल ही रोक दिए

1942 और 1946… इन दोनों सालों में कॉमनवेल्थ गेम्स होने थे, लेकिन दुनिया द्वितीय विश्व युद्ध में जल रही थी। लाखों लोग मारे जा रहे थे। ऐसे में खेलों की कोई जगह नहीं थी। इतिहास में केवल यही दो संस्करण हैं, जो विश्व युद्ध की वजह से रद्द हुए। 1950 में न्यूजीलैंड के ऑकलैंड से खेलों की वापसी हुई।

जब साम्राज्य टूट गया, तो खेलों का नाम भी बदल गया

1930 में इन खेलों का नाम था- ब्रिटिश एम्पायर गेम्स, लेकिन अगले तीन दशकों में दुनिया बदल गई। भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, घाना, नाइजीरिया, मलेशिया जैसे कई देश आजाद हो गए। ब्रिटिश साम्राज्य सिकुड़ने लगा और नाम बदलने लगे।

भारत 24 साल बाद जीता पहला गोल्ड

1958… कार्डिफ। एक दुबला-पतला धावक ट्रैक पर उतरा। नाम था मिल्खा सिंह। उन्होंने 440 यार्ड दौड़ जीतकर इतिहास रच दिया। वे कॉमनवेल्थ गेम्स की एथलेटिक्स स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाले पहले भारतीय बने।

इस जीत के बाद उन्हें ‘फ्लाइंग सिख’ कहा जाने लगा। उसी संस्करण में पहलवान लीला राम ने भी स्वर्ण पदक जीता।

मिल्खा सिंह ने 46.71 सेकंड में 440 यार्ड की दौड़ पूरी कर स्वर्ण पदक जीता था।

मिल्खा सिंह ने 46.71 सेकंड में 440 यार्ड की दौड़ पूरी कर स्वर्ण पदक जीता था।

भारत 76 साल बाद बना मेजबान

भारत 1934 में कॉमनवेल्थ गेम्स में शामिल हुआ और 2010 में उसने मेजबानी की, यानी 76 साल बाद। नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी करने वाला दक्षिण एशिया का पहला शहर बना। 71 कॉमनवेल्थ देशों और क्षेत्रों के करीब 6,000 खिलाड़ी 17 खेलों की 272 स्पर्धाओं में उतरे।

मेजबान होने का दबाव कम नहीं था, लेकिन भारत ने 38 स्वर्ण, 27 रजत और 36 कांस्य समेत 101 पदक जीतकर इतिहास रच दिया। पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की पदक तालिका में भारत ऑस्ट्रेलिया के बाद दूसरे स्थान पर पहुंचा। आज भी यह भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है।

नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स (2010) के उद्घाटन समारोह का भव्य आयोजन किया। भारत ने पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी कर रहा था।

नई दिल्ली कॉमनवेल्थ गेम्स (2010) के उद्घाटन समारोह का भव्य आयोजन किया। भारत ने पहली बार कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी कर रहा था।

2026 कॉमनवेल्थ गेम्स में 126 भारतीय खिलाड़ी हिस्सा लेंगे

2026 कॉमनवेल्थ गेम्स 23 जुलाई से 2 अगस्त तक स्कॉटलैंड के ग्लासगो में होंगे। इस बार सिर्फ 10 खेल शामिल हैं। भारत 126 खिलाड़ियों का दल भेज रहा है, जो एथलेटिक्स, मुक्केबाजी, वेटलिफ्टिंग, जूडो, तैराकी, ट्रैक साइक्लिंग, जिम्नास्टिक, लॉन बॉल्स, 3×3 बास्केटबॉल और पैरा कॉम्पिटीशन में हिस्सा लेगा। मीराबाई चानू और लवलीना बोरगोहैन भारत की ध्वजवाहक होंगी।

वहीं, 2030 में कॉमनवेल्थ गेम्स एक बार फिर भारत लौटेंगे। मेजबानी अहमदाबाद करेगा। 2030 में ही कॉमनवेल्थ गेम्स के 100 साल पूरे हो रहे हैं, इसलिए इसे खास माना जा रहा है।

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