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Supreme Court Warning to FSSAI


नई दिल्ली6 मिनट पहले

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पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स के वार्निंग लेबल पर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और FSSAI को सख्त अल्टीमेटम दिया है। कोर्ट ने कहा कि पैकेज्ड फूड प्रोडक्ट्स- जैसे नमकीन, बिस्किट, चिप्स और कोल्ड ड्रिंक्स पर चीनी, नमक और फैट की चेतावनी देने वाले फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल लगाने पर अगर सरकार फैसला लेने में असमर्थ है, तो न्यायपालिका खुद इस पर आदेश जारी करेगी।

इस पूरे मामले को सवाल-जवाब में समझें…

सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने पैकेज्ड फूड वार्निंग लेबल को लेकर केंद्र सरकार से क्या कहा?

जवाब: सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा- ‘अगर आप इसे लागू नहीं कर सकते, तो हम आदेश जारी करेंगे।’

कोर्ट ने कहा कि यह मामला देश के नागरिकों और विशेषकर बढ़ते बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़ा है। इसलिए इस पर कोई भी निर्णय कॉरपोरेट कंपनियों के दबाव में आकर नहीं लिया जाना चाहिए।

सवाल: कोर्ट में यह सुनवाई क्यों हुई और किसने याचिका दाखिल की थी?

जवाब: यह सुनवाई एक जनहित याचिका (PIL) पर हुई। याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट के समक्ष फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की 7 मार्च की बैठक के मिनट्स पेश किए। इसमें दिखाया गया कि FSSAI द्वारा लिए गए निर्णय सुप्रीम कोर्ट के पिछले निर्देशों के सीधे विपरीत थे।

याचिकाकर्ता ने बताया कि FSSAI केवल खाद्य उद्योग (कंपनियों) के विरोध को आधार बना रहा है, जबकि सिविल सोसाइटी द्वारा प्रस्तुत उन प्रमाणों को नजरअंदाज किया जा रहा है जो स्वास्थ्य सुरक्षा के लिए वार्निंग लेबल के पक्ष में हैं।

सवाल: FSSAI और कंपनियों का इस वार्निंग लेबल पर क्या कहना है?

जवाब: FSSAI ने कोर्ट में बताया कि फूड इंडस्ट्री पैकेट के सामने वाले भाग पर सख्त ‘वार्निंग लेबल’ लगाने के खिलाफ है। इसके विकल्प के रूप में FSSAI ने एक न्यूट्रिशन टेबल में एडेड शुगर, सैचुरेटेड फैट और नमक की दैनिक अनुशंसित मात्रा (RDA) दर्शाने का सुझाव दिया है।

कंपनियों का मानना है कि पैकेट के आगे लाल चेतावनी वाले निशान से उनके व्यापार पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

सवाल: सरकार ने अपनी दलील में भारतीय खान-पान और नमकीन का क्या तर्क दिया?

जवाब: केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) ब्रिजेंदर चाहर ने तर्क दिया कि पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों (जैसे नमकीन, भुजिया और स्नैक्स) में स्वाभाविक रूप से नमक और वसा (फैट) का स्तर अधिक होता है। यदि विकसित देशों के मानक लागू किए गए तो कई पारंपरिक भारतीय खाद्य पदार्थों पर ‘रेड वार्निंग मार्क’ लग जाएगा।

सवाल: सरकार के ‘भारतीय नमकीन’ और विकसित देशों वाले तर्क पर कोर्ट ने क्या कहा?

जवाब: अदालत ने सरकार के इस तर्क को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सवाल किया- ‘क्या भारत को हमेशा एक अविकसित देश ही बने रहना चाहिए?’ कोर्ट ने पूछा कि क्या सरकार अपने नागरिकों और बच्चों का स्वास्थ्य सुनिश्चित नहीं करना चाहती? बेंच ने कहा कि निर्माता इसे पसंद न करें, लेकिन उपभोक्ता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह क्या खा रहा है।

सवाल: क्या इस तरह के वार्निंग लेबल लगने से पैक्ड फूड की बिक्री पर रोक लग जाएगी?

जवाब: नहीं, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वार्निंग लेबल का उद्देश्य बिक्री रोकना नहीं, बल्कि ग्राहक को जागरूक करना है। बेंच ने कहा कि निर्माता सोच सकते हैं कि इससे उनका बिजनेस प्रभावित होगा, लेकिन चेतावनी देखने के बाद अंतिम निर्णय ग्राहक का होगा कि वह उत्पाद खरीदना चाहता है या नहीं। इस विषय में निर्माताओं की भूमिका निर्णायक नहीं हो सकती।

सवाल: सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सरकार को कितना समय दिया है?

जवाब: सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और FSSAI को वार्निंग लेबल प्रस्ताव का पालन करने के लिए 2 सप्ताह का समय दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि यदि निर्धारित समय में कदम नहीं उठाए गए, तो अगली सुनवाई पर अदालत अपना फैसला सुनाएगी।

सवाल: इस फैसले का आम उपभोक्ताओं और पैक्ड फूड इंडस्ट्री पर क्या असर पड़ेगा?

जवाब: यदि ‘फ्रंट-ऑफ-पैक वार्निंग लेबल’ लागू होता है, तो उपभोक्ताओं को खरीदारी करते समय ही पैकेट के सामने स्पष्ट दिख जाएगा कि उत्पाद में चीनी, नमक या फैट की मात्रा तय सीमा से अधिक तो नहीं है। इससे लोग खान-पान के प्रति अधिक जागरूक होंगे और कंपनियों को भी अपने प्रोडक्ट्स के पोषण स्तर में सुधार करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा।

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