3 मिनट पहले
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लोकसभा ने आज यानी 5 अगस्त को ‘बैंकर्स बुक्स एविडेंस बिल, 2026’ को मंजूरी दे दी। इस नए कानून के लागू होने के बाद अब बैंकिंग के डिजिटल और वर्चुअल रिकॉर्ड्स को अदालत में ठोस सबूत माना जाएगा। यह बिल अंग्रेजों के जमाने के पुराने कानून की जगह लेगा। इसका मुख्य मकसद देश के तेजी से बदलते डिजिटल बैंकिंग सिस्टम को कानूनी सुरक्षा और मान्यता देना है।
हंगामे के बीच पास हुआ बिल
दोपहर 2 बजे जैसे ही सदन की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई, विपक्षी सांसदों ने अलग-अलग मुद्दों पर नारेबाजी जारी रखी। भारी हंगामे और शोर-शराबे के बीच ही वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बिल को विचार और पास कराने के लिए सदन के सामने रखा, जिसे ध्वनिमत से पारित कर दिया गया।
अंग्रेजों का 135 साल पुराना कानून बदलेगा
यह नया बिल बैंकर्स बुक्स एविडेंस एक्ट, 1891 को रिप्लेस करेगा। पुराना कानून उस दौर का था जब सारा बैंकिंग काम कागजों और बही-खातों में होता था। समय के साथ बैंकिंग सिस्टम पूरी तरह बदल चुका है और अब कोर बैंकिंग, मोबाइल ऐप, यूपीआई और ऑनलाइन ट्रांजैक्शन का जमाना है। ऐसे में पुराने कानून में डिजिटल डेटा को सबूत के तौर पर पेश करने में कानूनी अड़चनें आती थीं।
आम लोगों और बैंकों को क्या फायदा होगा?
- कोर्ट में सुनवाई होगी आसान: डिजिटल ट्रांजैक्शन, ऑनलाइन एंट्रीज, ई-स्टेटमेंट और वर्चुअल रिकॉर्ड्स को अब अदालत में सीधे एविडेंस (सबूत) के रूप में स्वीकार किया जाएगा।
- धोखाधड़ी पर कसेगी नकैल: साइबर क्राइम, ऑनलाइन बैंकिंग फ्रॉड और वित्तीय घोटालों के मामलों में डिजिटल सबूतों की मदद से जांच एजेंसियों को आरोपियों के खिलाफ केस मजबूत करने में मदद मिलेगी।
- समय की बचत होगी: बैंकों को अब अदालती मामलों के लिए भारी-भरकम फिजिकल दस्तावेज या ओरिजिनल रजिस्टर पेश करने की जरूरत नहीं होगी, जिससे अदालती कार्यवाही की रफ्तार तेज होगी।
नॉलेज बॉक्स: क्या था 1891 का कानून और क्यों पड़ी बदलने की जरूरत?
- 1891 का कानून: जब भारत में बैंक सिर्फ कागजी रजिस्टरों पर काम करते थे, तब यह तय करने के लिए कानून बनाया गया था कि बैंक के बहियों की कॉपी को कोर्ट में कैसे पेश किया जाए।
- बदलाव की वजह: आज 90% से ज्यादा बैंकिंग लेनदेन डिजिटल जैसे UPI, IMPS, ई-बैंकिंग हो चुके हैं। नए बिल से लीगल फ्रेमवर्क को आधुनिक टेक्नोलॉजी के हिसाब से बनाया गया है।
