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Nagastra Drone Thwarts Enemy Plot in Operation Sindoor


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छत्रपति संभाजीनगर1 घंटे पहलेलेखक: रवींद्र भजनी

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सत्यनारायण नुवाल, स्वदेशी ड्रोन ‘नागास्त्र’ बनाने वाली कंपनी सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के फॉउंडर और चेयरमैन हैं। - Dainik Bhaskar

सत्यनारायण नुवाल, स्वदेशी ड्रोन ‘नागास्त्र’ बनाने वाली कंपनी सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड के फॉउंडर और चेयरमैन हैं।

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस स्वदेशी वेपनाइज्ड ड्रोन ‘नागास्त्र’ ने दुश्मन की साजिश को नाकाम किया, उसे सोलर इंडस्ट्रीज इंडिया लिमिटेड ने बनाया है। अब यह कंपनी वेपनाइज्ड डॉग रोबोट और इंसानों जैसा दिखने वाला ‘ह्यूमनॉइड रोबोट’ भी बना रही है।

कंपनी के फॉउंडर और चेयरमैन पद्मश्री सत्यनारायण नुवाल ने ‘दैनिक भास्कर’ को बताया कि देश की सुरक्षा के लिए इन रोबोट्स को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस तापमान में भी तैनात किया जा सकेगा। कंपनी माइक्रो मिसाइल पर आधारित एंटी-ड्रोन सिस्टम ‘भार्गवास्त्र’ जैसे स्वदेशी प्रोजेक्ट्स पर भी काम कर रही है। पढ़िए पूरा इंटरव्यू…

सवाल: ऑपरेशन सिंदूर में आपके नागास्त्र और लॉइटरिंग म्यूनिशन का इस्तेमाल हुआ, इस बारे में कुछ बताएंगे?

जवाब: 2020 में अजरबैजान और आर्मेनिया युद्ध में ड्रोन के इस्तेमाल ने पारंपरिक युद्ध का स्वरूप ही बदल दिया। दुनिया के सामने हथियारों का बिल्कुल नया रूप आया। हमने भी 2020 के बाद अनमैन्ड एरियल सिस्टम बनाने का फैसला किया। तीन साल की मेहनत के बाद हमने देश का पहला वेपनाइज्ड ड्रोन ‘नागास्त्र-1’ बनाया, जिसकी आपूर्ति हमारी सेना को की गई।

‘ऑपरेशन सिंदूर’ में इसका सटीक इस्तेमाल होना मैं केवल दैवीय कृपा मानता हूं। नागास्त्र-1 की रेंज 15 किलोमीटर है। इसके बाद हमने नागास्त्र-1A, नागास्त्र-1B और नागास्त्र-2 सहित अन्य वेरिएंट्स तैयार किए हैं। इन्हें ‘कामिकेज ड्रोन’ या ‘सुसाइड ड्रोन’ भी कहा जाता है।

यह लक्ष्य के ऊपर काफी देर तक मंडरा सकता है, दुश्मनों का पता लगा सकता है और सटीक संकेत मिलते ही विस्फोटक वॉरहेड के साथ सीधे उससे टकराकर हमला कर सकता है। हमने सेना को इसकी सप्लाई भी शुरू कर दी है। इनकी रेंज 25 से 50 किलोमीटर है और इनमें 1 से 5 किलोग्राम तक का विस्फोटक लगाया जा सकता है।

सवाल: क्या इन ड्रोन्स में स्वार्म टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है?

जवाब: स्वार्म ड्रोन अभी अंडर-डेवलपमेंट है। ऑपरेशन सिंदूर के समय उधर से आए छोटे-छोटे ड्रोन्स का जवाब देने के लिए हमारे बड़े ड्रोन्स का इस्तेमाल किया गया। इसके बाद हमने काउंटर ड्रोन सिस्टम के रूप में माइक्रो मिसाइल पर आधारित ‘भार्गवास्त्र’ डेवलप किया है।

यह 10 किलोमीटर तक देख सकता है और 2.5 किलोमीटर के दायरे में आने वाले किसी भी बाहरी ड्रोन या यूएवी को मार गिराने की क्षमता रखता है। अलग-अलग रेंज में इसका ट्रायल टेस्टिंग हो चुका है। स्वार्म ड्रोन छोटे और ऑटोनोमस (स्वायत्त) ड्रोन्स का नेटवर्क होता है, जो एआई और एडवांस सॉफ्टवेयर एल्गोरिदम की मदद से एक साथ मिलकर काम करते हैं।

झुंड में होने के कारण, ये एक ही समय में सैकड़ों की संख्या में दुश्मन के एयर डिफेंस सिस्टम, राडार या ठिकानों को निशाना बनाते हैं। इस झुंड के अलग-अलग ड्रोन्स को अलग-अलग काम सौंपे जा सकते हैं; जैसे कि कुछ जासूसी करते हैं, कुछ इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग करते हैं, तो कुछ सीधे हमला करते हैं।

सवाल: क्या आप अब ‘ब्रह्मोस’ भी देश में ही बना रहे, इसमें क्या डेवलपमेंट हुआ है?

जवाब: एक साल पहले तक ब्रह्मोस का बूस्टर और रॉकेट सिस्टम रूस से इम्पोर्ट किया जा रहा था। हमने डीआरडीओ के सहयोग से इसे अपने यहां डेवलप किया है। रूस के वैज्ञानिक भी यहाँ आए थे।

उन्हें पांच दिन यहां रहकर व्यवस्था देखनी थी। लेकिन, पहले ही दिन शाम को उन्होंने हमारे सिस्टम को मंजूरी दी है। अब हमने 100 रॉकेट्स तैयार किए हैं; इसके अलावा इसका वॉरहेड भी बनाया है। फिलहाल उनकी टेस्टिंग चल रही है।

सवाल: दुनिया भर में एआई और रोबोटिक्स का इस्तेमाल बढ़ा, क्या हम तैयार हैं?

जवाब: अजरबैजान और आर्मेनिया के 2020 के युद्ध के बाद रूस-यूक्रेन और ईरान-इजरायल युद्ध में अनमैन्ड एरियल सिस्टम और लॉन्ग रेंज मिसाइलों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल हुआ है। आने वाले समय में एआई और रोबोट्स का महत्व और बढ़ेगा।

इसमें एक्युरेसी और किफायती कीमत सबसे महत्वपूर्ण है। रक्षा खरीद नीति 2026 में इस दिशा में काफी कदम उठाए गए हैं। मैं इतना ही कह सकता हूं कि हम सही दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

सवाल: एआई और रोबोट्स को लेकर आपके यहां क्या काम हो रहा है?

जवाब: हमने काफी कुछ काम किया है और कर भी रहे हैं। नागपुर के मिहान सेज में हमें पजेशन लेटर मिल गया है। हमें कुछ मंजूरियों का इंतजार है, जो दो-तीन महीनों में मिल जाएंगी। तीन-चार महीनों में हम अपना काम शुरू कर देंगे। आज हमारे जवानों को माइनस 40 डिग्री सेल्सियस (−40∘C) तापमान में तैनात रहना पड़ता है।

सर्विलांस और सिक्योरिटी को और बेहतर बनाने के लिए हम एक साल के भीतर देश का पहला वेपनाइज्ड रोबोट बनाएंगे। हम डॉग रोबोट का प्रोटोटाइप बना रहे हैं। इसके बाद दो-तीन महीनों में हम ह्यूमनॉइड (इंसानों जैसा दिखने वाला रोबोट) तैयार कर लेंगे।

सवाल: क्या आप पिनाका के अलावा भी रॉकेट टेक्नोलॉजी पर काम कर रहे हैं?

जवाब: यह बताना संभव नहीं है। हमारे पास जो पिनाका रॉकेट बन रहा है, वह फिलहाल 75 किलोमीटर की दूरी तक मार कर सकता है। हमने सेना को इसकी रेंज बढ़ाकर 300 किलोमीटर करने का एक प्रस्ताव दिया है। हमें पूरा विश्वास है कि हम जल्द ही इसमें भी सफलता हासिल करेंगे। हमारी भारतीय सेना और केंद्र सरकार से बातचीत चल रही है।

सवाल: गोला-बारूद के मामले में हमारी आत्मनिर्भरता का स्तर अभी क्या है?

जवाब: हाई एनर्जी मटेरियल और प्रोपेलेंट के मामले में हम ग्लोबल लेवल के बराबर हैं। जो मटेरियल पहले हमारे यहाँ 100% इम्पोर्ट होता था, आज हम उसका 70% से ज्यादा मटेरियल यूएस, इजरायल, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों को एक्सपोर्ट कर रहे हैं।

सवाल: महाराष्ट्र में अहिल्यानगर-संभाजीनगर डिफेंस कॉरिडोर पर तेजी से काम हो रहा, इस पर आपकी क्या राय है?

जवाब: डिफेंस कॉरिडोर को लेकर अगर कोई सबसे ज्यादा प्रैक्टिकल और एग्रेसिव है, तो वह महाराष्ट्र सरकार ही है। जिस तरह से सिस्टेमैटिक ढंग से डिफेंस कॉरिडोर का काम चल रहा है, उससे मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि यहां का डिफेंस कॉरिडोर सबसे ज्यादा सफल होगा। महाराष्ट्र को अपनी भौगोलिक स्थिति का फायदा मिलता है, जो डिफेंस सेक्टर के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है।

दूसरी बात, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की विजनरी पॉलिसी इसे तेजी से आगे ले जा रही है। निश्चित रूप से मुझे ऐसा लगता है कि जितने भी डिफेंस कॉरिडोर पांच-सात साल पहले आए या जो अब आ रहे हैं, उन सबमें महाराष्ट्र का डिफेंस कॉरिडोर बहुत तेजी से आगे बढ़ेगा।

सवाल: क्या भारत में ‘स्वदेशी बनाम इम्पोर्टेड’ की मानसिकता में बदलाव आया है?

जवाब: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विजन के कारण पिछले कुछ वर्षों में सरकार की सोच में बड़ा बदलाव आया है। पॉलिसी बहुत अच्छी बनाई गई है। लेकिन, पॉलिसी को लागू करने वाले सिस्टम में अभी बहुत काम करने की जरूरत है। सिर्फ नीतियां अच्छी होने से काम नहीं चलेगा, बल्कि अकाउंटेबिलिटी और मॉनिटरिंग सिस्टम का मजबूत होना आवश्यक है।

टेक्नोलॉजी के मामले में पोलैंड, स्वीडन, डेनमार्क और फ्रांस जैसे छोटे देश हमसे आगे हैं। वहाँ काम करने वाले 50 प्रतिशत से अधिक लोग भारतीय ही हैं। हमारे यहाँ जो अवसर मिलने चाहिए थे, वे कुछ कारणों से नहीं मिल पाए।

सवाल: चंद्रपुर में एक्सप्लोसिव लाइसेंस लेने से लेकर पद्मश्री तक का सफर कैसा रहा?

जवाब: मैंने 17 साल की उम्र से ही अपना बिजनेस शुरू कर दिया था। राजस्थान के भीलवाड़ा में मेरा जन्म हुआ, वहां से मैं बल्लारशाह आया। वहां भी दो साल संघर्ष किया। जब कुछ बात नहीं बनी, तो मैं चंद्रपुर आ गया। चंद्रपुर में अब्दुल सत्तार अल्लाह भाई नाम के एक सज्जन थे, जिनके पास एक्सप्लोसिव की मैगजीन (लाइसेंस) थी। मैंने उनसे वह मैगजीन किराए पर लेकर अपने करियर की शुरुआत की।

1984 में दुनिया की सबसे बड़ी ‘आईसीआई’ कंपनी ने हमें डिस्ट्रीब्यूटर बनाया और 1994 तक आते-आते हम देश के सबसे बड़े ट्रेडिंग हाउस बन गए। 1995-96 में हमने स्मॉल स्केल पर एक्सप्लोसिव मैन्युफैक्चरिंग शुरू किया और 2004 तक हम देश के सबसे बड़े प्रोड्यूसर और एक्सपोर्टर बन गए।

2010 में हमने तय किया कि हमें डिफेंस सेक्टर में आना चाहिए। 2014 में बीजेपी सरकार ने प्राइवेट सेक्टर में कम्प्लीट एमुनिशन का लाइसेंस देने का प्रावधान किया। 2015 में हमें यह लाइसेंस मिला। हमारे देश में 100 साल से सिर्फ ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां थीं या फिर हम इम्पोर्ट करते थे, इसमें आत्मनिर्भर होना आवश्यक है। इसी सोच के साथ हमने इस सेक्टर में एंट्री की।

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