TCS Employee Monitoring Controversy | Laptop System Performance Tracking


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मुंबईकुछ ही क्षण पहले

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कर्मचारियों की मॉनिटरिंग को लेकर देश की सबसे बड़ी आईटी कंपनी टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) विवादों में आ गई है। रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी अपने कर्मचारियों के लैपटॉप और वर्कस्टेशन पर मॉनिटरिंग टूल्स का इस्तेमाल कर रही है।

हालांकि, टीसीएस का कहना है कि इन टूल्स का मकसद किसी कर्मचारी की व्यक्तिगत गतिविधियों पर नजर रखना नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की ओवरऑल परफॉर्मेंस और सिस्टम सिक्योरिटी को बेहतर बनाना है।

क्या करते हैं ये नेटवर्क मॉनिटरिंग टूल्स?

कंपनियां अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षित रखने और उसकी परफॉर्मेंस सुधारने के लिए नेटवर्क मॉनिटरिंग टूल्स का इस्तेमाल करती हैं।

इन सिस्टम्स का मुख्य काम नेटवर्क में किसी भी असामान्य व्यवहार की पहचान करना, तकनीकी समस्याओं (तकनीकी दिक्कतों) को हल करना, डिवाइसेस की परफॉर्मेंस में सुधार करना और कॉरपोरेट डेटा को साइबर खतरों से बचाना होता है।

बिजनेस और सुरक्षा के लिहाज से कंपनियों के लिए ऐसे टूल्स का उपयोग करना एक सामान्य प्रक्रिया माना जाता है।

विवाद की मुख्य वजह: व्यक्तिगत एक्टिविटी की ट्रैकिंग

विवाद तब शुरू होता है जब ये टूल्स सिस्टम-लेवल की जानकारी से आगे बढ़कर किसी कर्मचारी के निजी काम और एक्टिविटी का बारीक रिकॉर्ड (डिटेल्ड रिकॉर्ड्स) रखना शुरू कर देते हैं।

मनी कंट्रोल की एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि टीसीएस के टूल्स को एप्लिकेशन-लेवल तक की विजिबिलिटी (पहुंच) हासिल है।

वहीं दूसरी तरफ टीसीएस ने अपने आधिकारिक बयान में साफ किया है कि उनकी निगरानी सिर्फ मैक्रो-लेवल (बड़े स्तर) पर नेटवर्क परफॉर्मेंस तक ही सीमित है और वे व्यक्तिगत कर्मचारी की गतिविधियों को ट्रैक नहीं करते हैं।

मेटा भी झेल चुकी है कर्मचारी मॉनिटरिंग पर आलोचना

कार्यस्थल पर कर्मचारियों की निगरानी (वर्कप्लेस मॉनिटरिंग) का यह मुद्दा केवल टीसीएस तक सीमित नहीं है। वैश्विक टेक इंडस्ट्री में पहले भी ऐसे मामले सामने आ चुके हैं।

दिग्गज टेक कंपनी मेटा (Meta) को भी अपने एक AI-संबंधित प्रोजेक्ट के दौरान आलोचना का सामना करना पड़ा था। मेटा ने एक ऐसा सिस्टम पेश किया था जो कर्मचारियों के की-स्ट्रोक्स (keystrokes) और माउस एक्टिविटी का डेटा कलेक्ट कर सकता था।

बाद में भारी विरोध के चलते मेटा को कर्मचारियों के लिए डेटा कलेक्शन रोकने और छूट मांगने का विकल्प देना पड़ा था।

कानूनी नियम और भविष्य की स्थिति

कर्मचारियों की मॉनिटरing का यह मुद्दा अलग-अलग देशों में कानूनी जांच के दायरे में भी आ चुका है। अलग-अलग क्षेत्राधिकारों (jurisdictions) और देशों में एम्प्लॉई मॉनिटरिंग को लेकर नियम और कड़े कानून काफी भिन्न हैं।

फिलहाल इस पूरे मामले में सबसे बड़ा अस्पष्ट बिंदु यही बना हुआ है कि टीसीएस के टूल्स तकनीकी रूप से किस-किस जानकारी तक पहुंच सकते हैं और वास्तविक रूप में उस डेटा का उपयोग किस तरह किया जा रहा है।

क्या अंतर है मैक्रो-लेवल और एम्प्लॉई-लेवल मॉनिटरिंग में?

मैक्रो-लेवल मॉनिटरिंग: इसमें सिर्फ यह देखा जाता है कि नेटवर्क पर कितना लोड है, इंटरनेट स्पीड कैसी मिल रही है और कोई साइबर अटैक या तकनीकी खराबी तो नहीं है। इसमें किसी व्यक्ति की निजी फाइल या एक्टिविटी से कोई मतलब नहीं होता।

एम्प्लॉई-लेवल मॉनिटरिंग: इसमें कर्मचारी ने कौन सी वेबसाइट खोली, कीबोर्ड पर क्या टाइप किया (Keystrokes), माउस कितनी बार हिलाया और किस एप्लिकेशन पर कितना समय बिताया, इसकी विस्तृत ट्रैकिंग की जाती है।

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