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साल 1943 की बात है। एक युवा लड़का अपने सपनों को पूरा करने के लिए लाहौर से मुंबई पहुंचा। जेब में सिर्फ 30 रुपए थे और रहने के लिए कोई ठिकाना नहीं था। फिल्म इंडस्ट्री में पहचान बनाने का सपना था, लेकिन सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि मुंबई जैसे शहर में गुजारा कैसे हो। शुरुआत में उसे चॉल में रहना पड़ा। कुछ दिन बीते तो पैसे खत्म होने लगे। फिल्मों में काम मिलने की कोई उम्मीद नजर नहीं आ रही थी। आखिरकार पेट पालने के लिए उसे नौकरी करनी पड़ी। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में क्लर्क की नौकरी मिली, जहां वह ब्रिटिश सरकार के लिए मिलिट्री सेंसर का काम करते थे। उसे महीने की 65 रुपए तनख्वाह मिलती थी। लेकिन जिस लड़के के पास मुंबई पहुंचने के लिए सिर्फ 30 रुपए थे, उसने हार नहीं मानी। कुछ साल बाद वही शख्स हिंदी सिनेमा का ऐसा सितारा बना, जिसे लोग ‘एवरग्रीन स्टार’ कहने लगे। हम बात कर रहे हैं देव आनंद की और उनकी 103वीं बर्थ एनिवर्सरी पर जानते हैं उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ खास बातें… पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुरदासपुर जिले में धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के रूप में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद गुरदासपुर में वकील थे और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे। देव आनंद चार भाइयों में तीसरे थे। उनके भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी फिल्म जगत से जुड़े रहे, जबकि उनकी बहन शील कांता कपूर फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां थीं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई डलहौजी के सेक्रेड हार्ट स्कूल से की और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए किया। पिता ने पढ़ाई के लिए पैसे देने से मना कर दिया था देव आनंद आगे पढ़ना चाहते थे और उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाने का सपना देखते थे, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह किसी बैंक में नौकरी कर लें, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके। पिता ने साफ कह दिया कि अब उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं हैं। इसके बाद देव आनंद ने तय किया कि अगर जिंदगी में संघर्ष करना ही है, तो क्यों न अपने बचपन के सपने एक्टिंग के लिए संघर्ष किया जाए। इसी सपने को पूरा करने के लिए जून 1943 में वह लाहौर से ट्रेन पकड़कर मुंबई के लिए निकल पड़े। शुरुआत में काम नहीं मिला और पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 65 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की। बाद में एक अकाउंटिंग फर्म में 85 रुपए की तनख्वाह पर क्लर्क का काम भी किया। अभिनेता बनने की इच्छा उन्हें अशोक कुमार की फिल्मों से मिली। मिलिट्री सेंसर ऑफिस में करीब एक साल तक नौकरी करने के बाद देव आनंद अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए। चेतन उस समय भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े थे। उन्होंने छोटे भाई को भी अपने साथ जोड़ लिया। यहां से देव आनंद को थिएटर में काम करने और अभिनय सीखने का मौका मिला। फिर किस्मत ने साथ दिया। साल 1946 में उन्हें प्रभात टॉकीज की फिल्म ‘हम एक हैं’ में काम करने का मौका मिला। शर्ट की अदला-बदली, शुरू हुई देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती फिल्म ‘हम एक हैं’ में देव आनंद बतौर हीरो काम कर रहे थे, जबकि गुरु दत्त वहां असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे। स्टूडियो के सभी लोगों के कपड़े एक ही धोबी के पास जाते थे। एक दिन धोबी से ऐसी गलती हुई कि देव आनंद की सफेद शर्ट गुरु दत्त के कपड़ों के साथ चली गई। गुरु दत्त ने वह शर्ट पहन ली और स्टूडियो पहुंच गए। जब देव आनंद ने अपनी शर्ट गुरु दत्त के शरीर पर देखी, तो दोनों का आमना-सामना हुआ। लेकिन शर्ट को लेकर कोई नाराजगी नहीं हुई। दोनों इस अजीब संयोग पर खूब हंसे। यही छोटी-सी घटना आगे चलकर उनकी गहरी दोस्ती की शुरुआत बन गई। दोनों ने बाद में साथ काम भी किया। देव आनंद ने गुरु दत्त को फिल्म ‘बाजी’ के निर्देशन का मौका दिया। 1951 में रिलीज हुई यह फिल्म गुरु दत्त के निर्देशन करियर की महत्वपूर्ण शुरुआत बनी और देव आनंद के साथ उनकी दोस्ती भी सिनेमा के पर्दे पर नजर आई। फिल्म ‘जिद्दी’ ने देव आनंद के करियर की दिशा बदल दी। अशोक कुमार ने उन्हें इस फिल्म में काम करने का मौका दिया। फिल्म सफल रही और देव आनंद को पहचान मिली। इसके बाद उन्होंने सिर्फ अभिनेता बनकर रुकने के बजाय खुद फिल्में बनाने का फैसला किया। 1949 में बड़े भाई चेतन आनंद के साथ नवकेतन फिल्म्स की शुरुआत की। इसी बैनर के तहत बनी ‘बाजी’ 1951 में रिलीज हुई। यह फिल्म सफल रही और देव आनंद की स्टार इमेज और मजबूत हो गई। 1950 के दशक में देव आनंद की कई फिल्में सफल रहीं। ‘जाल’, ‘टैक्सी ड्राइवर’, ‘सीआईडी’, ‘पेइंग गेस्ट’ और ‘काला पानी’ जैसी फिल्मों ने उन्हें बड़े सितारों की कतार में खड़ा कर दिया। उनका बोलने का तेज अंदाज, संवाद अदायगी और कैमरे के सामने खास स्टाइल दर्शकों को पसंद आया। वह जिस तरह बात करते समय सिर हिलाते थे, वह भी उनकी पहचान बन गया। ‘गाइड’ ने करियर को दी नई पहचान 1960 का दशक देव आनंद के रोमांटिक हीरो वाले दौर के लिए खास रहा। ‘हम दोनों’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों ने उनके स्टारडम को और मजबूत किया। 1965 में रिलीज हुई ‘गाइड’ उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हुई। फिल्म में उनके साथ वहीदा रहमान थीं। यह फिल्म आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित थी और इसके फिल्म रूपांतरण में देव आनंद की महत्वपूर्ण भूमिका थी। फिल्म में उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाया, जो साधारण रोमांटिक हीरो की उनकी छवि से काफी अलग था। ‘गाइड’ ने उन्हें एक गंभीर अभिनेता के तौर पर भी स्थापित किया। हालांकि, डीडी नेशनल को दिए एक इंटरव्यू में देव आनंद ने फिल्म ‘गाइड’ को लेकर बताया था कि जब उन्होंने इस फिल्म की योजना बनाई थी, तब कई लोगों ने उन्हें पागल तक कहा था। देव आनंद के मुताबिक, लोगों को लगता था कि फिल्म सेंसर बोर्ड से पास नहीं होगी, क्योंकि इसकी कहानी में एडल्टरी यानी विवाहेतर संबंध का एंगल था। इसके अलावा उनकी रोमांटिक हीरो की इमेज को देखते हुए लोगों को यह भी डर था कि दर्शक उन्हें एक साधु के किरदार में स्वीकार नहीं करेंगे। देव आनंद ने बताया था कि फिल्म को लेकर शुरुआत में काफी आशंकाएं थीं। रिलीज के समय फिल्म को वैसी सफलता नहीं मिली और इसे बेचना भी मुश्किल हो रहा था। हालांकि, समय के साथ ‘गाइड’ को दर्शकों और आलोचकों के बीच अलग पहचान मिली और बाद में यह कल्ट फिल्म बन गई। नाव पलटी और शुरू हुई सुरैया से प्रेम कहानी देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित और अधूरी प्रेम कहानियों में से एक है। देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी की शुरुआत फिल्म ‘विद्या’ की शूटिंग के दौरान हुई। एक गाने की शूटिंग के दौरान नाव पलट गई और सुरैया पानी में गिर गईं। देव आनंद ने उन्हें बचाने के लिए पानी में छलांग लगा दी। इस घटना के बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और धीरे-धीरे यह रिश्ता प्यार में बदल गया। देव आनंद ने बाद में एक इंटरव्यू में सुरैया को अपनी जिंदगी का पहला सच्चा प्यार बताया था। फिल्म ‘जीत’ की शूटिंग के दौरान उन्होंने सुरैया को शादी के लिए प्रपोज किया। देव आनंद के मुताबिक, सुरैया ने उनका प्रस्ताव स्वीकार भी कर लिया था। देव आनंद ने सुरैया को 3,000 रुपए की हीरे की अंगूठी भेजी थी। इस अंगूठी को लेकर बाद में कई किस्से सामने आए। कहा गया कि सुरैया ने इसे समुद्र में फेंक दिया था। हालांकि, देव आनंद ने खुद कहा था कि उन्हें नहीं पता कि अंगूठी के साथ वास्तव में क्या हुआ था। परिवार को मंजूर नहीं था रिश्ता दोनों शादी करना चाहते थे, लेकिन सुरैया का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। देव आनंद ने सिमी गरेवाल के शो में बताया था कि उन्हें लगता था कि परिवार नहीं चाहता था कि सुरैया एक हिंदू युवक से शादी करें। देव आनंद के मुताबिक, सुरैया अपनी नानी और परिवार के काफी करीब थीं। उनकी नानी भी सुरैया के साथ शूटिंग पर मौजूद रहती थीं। एक फिल्म के सीन में देव आनंद को सुरैया की आंखों पर किस करना था। उस समय ऐसे सीन को लेकर सेंसर की आपत्तियां होती थीं। सुरैया की नानी सेट पर मौजूद थीं और वहां से हट नहीं रही थीं। देव आनंद ने बताया था कि शूटिंग टीम ने किसी तरह उन्हें कुछ देर के लिए सुरैया को बाहर ले जाकर बातचीत करने के लिए राजी किया। उनके जाते ही देव आनंद और सुरैया ने वह सीन जल्दी से शूट कर लिया।
‘मैं रोया और फिर खुद को मजबूत किया’ सिमी गरेवाल ने जब देव आनंद से पूछा कि क्या सुरैया ने कभी उन्हें बताया था कि परिवार शादी के खिलाफ है, तो उन्होंने कहा कि सुरैया ने उनसे कभी सीधे तौर पर ऐसा नहीं कहा। हालांकि, बाद में उन्हें महसूस हुआ कि वह परिवार के दबाव में थीं। एक समय ऐसा भी आया जब देव आनंद सुरैया से सीधे मुलाकात नहीं कर पा रहे थे। उन्हें किसी दूसरे व्यक्ति के जरिए सुरैया को चिट्ठियां भेजनी पड़ती थीं। इस स्थिति से वह बेहद निराश हुए। उन्होंने बताया था कि वह रोए, लेकिन इसके बाद खुद को संभाला और जिंदगी में आगे बढ़ गए। उनके रिश्ते को लेकर उस समय अखबारों में भी काफी चर्चा हुई थी। देव आनंद ने बताया था कि उन्होंने लोगों ने कहा था कि सुरैया को शादी न करने के लिए कुरान की कसम भी दिलाई गई थी। हालांकि, उन्होंने कभी सुरैया से इसकी पुष्टि नहीं की थी। सुरैया के निधन पर भी नहीं गए अस्पताल देव आनंद ने बताया था कि सुरैया से रिश्ता खत्म होने के बाद उनकी मुलाकात उनसे केवल एक-दो बार हुई। इसके बाद दोनों अपनी-अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गए। जब सुरैया के निधन की खबर देव आनंद को मिली, तो वह काफी दुखी हुए। उन्होंने बताया था कि सुरैया अस्पताल में थीं, लेकिन वह उनसे मिलने नहीं गए। उनका कहना था कि वह अपने निजी दुख को दुनिया के सामने नहीं लाना चाहते थे। उन्हें डर था कि मीडिया उनके आसपास जमा हो जाएगा और उनसे लगातार सवाल पूछेगा। सुरैया से अलग होने के बाद कल्पना कार्तिक से शादी समय आगे बढ़ा और देव आनंद की जिंदगी में अभिनेत्री मोना सिंह आईं, जिन्हें फिल्म इंडस्ट्री में कल्पना कार्तिक के नाम से जाना जाता था। फिल्म ‘टैक्सी ड्राइवर’ (1954) की शूटिंग के दौरान दोनों को एक-दूसरे से प्यार हुआ। दोनों ने शूटिंग के लंच ब्रेक के दौरान सेट पर ही बेहद सादगी से गुपचुप तरीके से शादी कर ली और ब्रेक खत्म होने के बाद वापस कैमरे के सामने आकर शॉट देने लगे। देव आनंद का काला कोट उनके स्टाइल की पहचान बना था देव आनंद का काला कोट उनके स्टाइल की पहचान बन गया था। 1958 में आई फिल्म काला पानी में सफेद शर्ट और काले कोट में उनका लुक काफी पसंद किया गया। इसके बाद एक किस्सा खूब चर्चित हुआ। कहा गया कि लड़कियां देव आनंद की एक झलक पाने के लिए बेकाबू हो जाती थीं। यहां तक कि कुछ लड़कियों के छत से कूदने की बातें भी सामने आईं। इसी वजह से दावा किया गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने देव आनंद के सार्वजनिक जगहों पर काला कोट पहनने पर रोक लगा दी थी। हालांकि, इस दावे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता। देव आनंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में इस कहानी को बेवकूफी भरा मिथक बताया था। अभिनय के बाद निर्देशन की ओर बढ़े 70 के दशक में देव आनंद ने निर्देशन की ओर भी कदम बढ़ाया। उनकी पहली निर्देशित फिल्म ‘प्रेम पुजारी’ थी। फिल्म को शुरुआत में बॉक्स ऑफिस पर खास सफलता नहीं मिली, लेकिन समय के साथ इसे अलग पहचान मिली। इसके बाद 1971 में आई ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ ने उन्हें निर्देशक के तौर पर बड़ी सफलता दी। फिल्म में जीनत अमान भी थीं। इस फिल्म के बाद जीनत अमान रातोंरात चर्चित हो गईं। देव आनंद ने आगे भी अभिनय के साथ निर्देशन और निर्माण का सिलसिला जारी रखा। देव आनंद उन कलाकारों में थे जिन्होंने उम्र बढ़ने के बावजूद फिल्मों में बतौर हीरो काम करना जारी रखा। ‘अमीर गरीब’, ‘वारंट’, ‘हीरा पन्ना’, ‘डार्लिंग डार्लिंग’ और ‘देस परदेस’ जैसी फिल्मों में उन्होंने अभिनय किया। 1978 में आई ‘देस परदेस’ की सफलता के बाद उनके लिए ‘एवरग्रीन स्टार’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल होने लगा। 80 के दशक में भी उन्होंने ‘मन पसंद’, ‘लूटमार’, ‘स्वामी दादा’, ‘हम नौजवान’ और ‘लश्कर’ जैसी फिल्मों में काम किया। वह नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ भी लगातार काम करते रहे और अपनी फिल्म निर्माण कंपनी के जरिए नए लोगों को मौके देते रहे। नवकेतन के जरिए नई प्रतिभाओं को मौका देव आनंद के लिए नवकेतन सिर्फ एक प्रोडक्शन हाउस नहीं था। यह उनके लिए नए विचारों और नई प्रतिभाओं को मौका देने का जरिया भी था। उन्होंने अपने करियर में अभिनय के साथ फिल्म निर्माण और लेखन पर भी काम किया। उन्होंने करीब 35 फिल्मों का निर्माण किया और 13 फिल्मों की कहानियां भी लिखीं। 2011 में आई ‘चार्जशीट’ उनकी आखिरी फिल्म थी, जिसे उन्होंने निर्देशित और प्रोड्यूस किया था। 3 दिसंबर 2011 को 88 साल की उम्र में लंदन में उनका निधन हो गया। उन्हें 2001 में पद्म भूषण और 2002 में दादा साहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ………………… यह खबर भी पढ़ें… अमजद खान की पुण्यतिथि:डिलीवरी के बाद बीवी को घर लाने के पैसे नहीं थे; ₹1.27 करोड़ की फीस अटकी, परिवार ने अंडरवर्ल्ड की मदद ठुकराई
‘मैं वो आदमी था, जो रोज 4–5 घंटे कसरत करता था। बैडमिंटन खेलता था, फ्री-हैंड एक्सरसाइज करता था, वेट उठाता था… लेकिन फिर एक एक्सीडेंट हुआ और मैं तीन महीने तक बिस्तर पर पड़ा रहा।’ एक पुराने इंटरव्यू में दिवंगत एक्टर अमजद खान ने अपनी जिंदगी का सबसे दर्दनाक दौर याद करते हुए यह बात कही थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
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नाव पलटी तो सुरैया को बचाने देव आनंद कूदे थे:शादी नहीं हुई तो पहली बार रोए, ‘गाइड’ को लेकर लोगों ने कहा था पागल