16 मिनट पहलेलेखक: राजकिशोर
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15 साल की बैडमिंटन खिलाड़ी तन्वी पात्री ने यूथ ओलिंपिक में मेडल पक्का कर लिया है। वे इस टूर्नामेंट के महिला सिंगल्स फाइनल में पहुंचने वाली पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं।
दैनिक भास्कर ने तन्वी के पिता रबिनारायण से बातचीत की। उन्होंने बताया कि बेटी को बैडमिंटन में आगे बढ़ाने के लिए उन्होंने चीन में सॉफ्टवेयर कंपनी की नौकरी छोड़ दी, जबकि महीने की सैलरी 5-6 लाख रुपए थी। इतना ही नहीं उन्होंने चीन के तीन कोचों से तन्वी को ट्रेनिंग दिलवाई।
बुधवार को सेनेगल के डकार में खेले गए सेमीफाइनल में तन्वी ने जापान की दूसरी सीड युजुनो वातानाबे को 21-14, 11-21, 21-19 से हराया। वह आज रात चीन की यी शिन झांग से गोल्ड मेडल मैच खेलेंगी।

7 साल की उम्र में बैडमिंटन खेलना शुरू किया
ओडिशा के बालासोर में जन्मीं तन्वी का बैडमिंटन से जुड़ाव चीन में हुआ। उस समय उनके पिता वहां सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल के तौर पर काम करते थे।
रबिनारायण को भी बैडमिंटन खेलने का शौक था। वे कॉलेज के दिनों से खेल रहे थे। 1990 के दशक में भारत में इस खेल के लिए बेहतर सुविधाएं नहीं थीं। इसलिए वे अपना शौक करियर में नहीं बदल सके।
चीन में नौकरी के दौरान वे रेगुलर बैडमिंटन खेलने जाते थे। करीब 7 साल की तन्वी भी उनके साथ कोर्ट पर जाने लगीं। बेटी की दिलचस्पी देखकर उन्होंने उसे ट्रेनिंग दिलानी शुरू की।

चीन के तीन कोचों ने तराशा खेल
तन्वी ने चीन में झांग लेई, श्यू शू और वू यू जैसे कोचों से ट्रेनिंग ली। उनके पिता के मुताबिक, इन कोचों का तन्वी का खेल निखारने में अहम योगदान रहा। इनमें से एक कोच श्यू शू का पिछले साल निधन हो गया था।
रबिनारायण के मुताबिक, चीन में बैडमिंटन के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर है। वहां सरकार ने खेलने के लिए अच्छी सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं। खिलाड़ी कम खर्च में लंबे समय तक कोर्ट पर अभ्यास कर सकते हैं। तन्वी को भी इसका फायदा मिला।
शुरुआती टूर्नामेंट में तन्वी को जीत और मेडल मिलने लगे। इससे खेल के प्रति उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। पिता ने कहा- ‘बच्चों में खेल के प्रति रुचि छोटी उम्र से ही विकसित करनी चाहिए। केवल माता-पिता के प्रेरित करने से बच्चा आगे नहीं बढ़ सकता। उसकी खुद की दिलचस्पी भी जरूरी है।’

तन्वी अपने पिता (व्हाइट शर्ट), मां और चीन के 2 कोच साथ।
2020 में बेटी को लेकर भारत लौटे
2019 में तन्वी ने चीन में कई अच्छे टूर्नामेंट जीते। इससे रबिनारायण को लगा कि बेटी में आगे बढ़ने की क्षमता है। हालांकि, कुछ समय बाद उन्हें ट्रेनिंग में कमी महसूस होने लगी। उनके सामने दो विकल्प थे। पहला, चीन में नौकरी जारी रखना। दूसरा, बेटी के खेल को प्राथमिकता देना।
उन्होंने दूसरा विकल्प चुना। 2020 में कोविड के दौरान वे परिवार के साथ भारत लौट आए। हालांकि, बाद में उन्होंने भारत से ही चीन की कंपनी के लिए काम करना जारी रखा।
कोविड में सीनियर खिलाड़ियों के साथ अभ्यास का मौका
- भारत लौटने के बाद तन्वी ने भुवनेश्वर की उड़ान अकादमी में अभ्यास शुरू किया। कोविड के दौरान कई जगह ट्रेनिंग बंद थी। लेकिन शहर से बाहर होने के कारण इस अकादमी में अभ्यास जारी रहा।
- इस दौरान तन्वी को ओडिशा के सीनियर खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका मिला। इनमें ज्यादातर लड़के थे। सामान्य एकेडमी में छोटे बच्चों को बड़े खिलाड़ियों के साथ खेलने का मौका कम मिलता है।
- कोविड के दौरान यह बाधा नहीं रही। करीब डेढ़ साल तक सीनियर खिलाड़ियों के साथ अभ्यास करने से तन्वी को काफी फायदा हुआ।
पिता ने खुद संभाली ट्रेनिंग की जिम्मेदारी
भारत लौटने के बाद रबिनारायण ने बेटी की ट्रेनिंग में खुद भी समय देना शुरू किया। उन्होंने प्राइवेट कोर्ट लेकर तन्वी के साथ अभ्यास किया। चीन में कोच से मिली तकनीकी ट्रेनिंग के आधार पर वे बेटी को खेल की बारीकियां समझाने लगे। उनका मानना है कि माता-पिता को बच्चे के खेल की बुनियादी समझ होनी चाहिए।
फिलहाल तन्वी बेंगलुरु के सेंटर फॉर बैडमिंटन एक्सीलेंस (CBE) में अभ्यास करती हैं। पहले यह प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन अकादमी के नाम से जाना जाता था। यहां उन्हें विमल कुमार, सागर और भास्कर जैसे कोच ट्रेनिंग दे रहे हैं।
वीजा रिजेक्ट होने से पिछले साल अंडर-17 एशियन चैंपियनशिप नहीं खेल पाईं
पिछले साल तन्वी का अंडर-17 एशियन चैंपियनशिप के लिए भारतीय टीम में चयन हुआ था। टूर्नामेंट चीन में होना था, लेकिन उनका वीजा रिजेक्ट हो गया। पिता रबिनारायण के मुताबिक, टीम के रवाना होने से ठीक पहले इसकी जानकारी मिली। वीजा मिलने तक टूर्नामेंट शुरू हो चुका था। तन्वी को बुधवार को वीजा मिला, जबकि मुकाबले मंगलवार से शुरू हो गए थे।
इस घटना के बाद रबिनारायण ने चीन में तन्वी के पुराने कोचों से संपर्क किया और उनसे इनविटेशन लेटर मंगवाया। इसका मकसद आगे चीन जाने के लिए वीजा प्रक्रिया समय रहते पूरी करना था।

तन्वी ने इसी साल U-17 एशियन टाइटल जीता था।
सालाना 30-40 लाख रुपए तक का खर्च
- रबिनारायण के मुताबिक, इंटरनेशनल बैडमिंटन सर्किट में खेलने के लिए काफी पैसा खर्च होता है। यूरोप में एक टूर्नामेंट खेलने पर करीब 3 लाख रुपए खर्च हो सकते हैं। इसमें यात्रा और ठहरने का खर्च भी शामिल है। साल में तीन ऐसे टूर्नामेंट खेलने पर करीब 9 लाख रुपए खर्च होंगे।
- उनका अनुमान है कि अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट, यात्रा, होटल और ट्रेनिंग मिलाकर सालाना 30 से 40 लाख रुपए की जरूरत पड़ सकती है। फिलहाल तन्वी को ओक्यू, ओडिशा सरकार और गेल इंडिया से सहयोग मिल रहा है। हालांकि, पिता के मुताबिक, यह मदद पूरी जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं है। बाकी खर्च उन्हें खुद उठाना पड़ता है।
- बैडमिंटन के उपकरणों की कीमत भी काफी बढ़ गई है। कोविड के समय करीब 1,000 से 1,200 रुपए में मिलने वाला शटल बैरल अब 5,000 रुपए तक पहुंच गया है। इसी तरह 5-6 हजार रुपए में मिलने वाला रैकेट अब करीब 20 हजार रुपए का हो गया है।

तन्वी अपने पिता रबिनारायण के साथ।
पिता बोले- यूथ ओलिंपिक सिर्फ एक पड़ाव
- रबिनारायण के मुताबिक, यूथ ओलिंपिक का मेडल तन्वी के करियर का सिर्फ एक पड़ाव है। सब-जूनियर से जूनियर और फिर सीनियर स्तर तक पहुंचने में कई चुनौतियां आती हैं। चोट और खराब प्रदर्शन के दौर में भी खिलाड़ी को धैर्य बनाए रखना जरूरी है।
- उन्होंने कहा कि सीनियर सर्किट में हर टूर्नामेंट जीतना संभव नहीं है। खिलाड़ी को हार स्वीकार करना और उससे सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। परिवार को भी खराब प्रदर्शन के समय खिलाड़ी का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।
- तन्वी भुवनेश्वर के ओटम ग्लोबल स्कूल में 10वीं क्लास में पढ़ती हैं। स्कूल उनकी पढ़ाई और खेल के बीच तालमेल बनाने में मदद करता है। बोर्ड परीक्षाओं के साथ ट्रेनिंग जारी रखना उनके लिए अहम होगा।
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