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UN General Debate 2026 | Trump-Iran President Meeting New York News


न्यूयॉर्क5 मिनट पहले

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संयुक्त राष्ट्र यानी UN की जनरल डिबेट आज से शुरू हो रही है। यह 28 सितंबर तक चलेगी। न्यूयॉर्क में होने वाली इस बैठक में 193 सदस्य देशों के नेता या वरिष्ठ प्रतिनिधि शामिल होंगे।

इस बार अमेरिका और ईरान के राष्ट्रपतियों की संभावित मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने कहा है कि वह ईरानी राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए तैयार हैं।

दोनों नेता ऐसे समय एक ही शहर में होंगे, जब अमेरिका और ईरान के बीच करीब 7 महीने से युद्ध चल रहा है। ऐसे में दोनों के बीच संभावित बातचीत को अहम माना जा रहा है।

UN जनरल डिबेट क्या होती है?

आसान भाषा में समझें तो यह वह मौका है जब संयुक्त राष्ट्र के लगभग सभी सदस्य देश एक ही मंच से दुनिया के सामने अपनी बात रखते हैं।

UN में 193 सदस्य देश हैं और महासभा में हर देश का एक वोट होता है। हर साल सितंबर में इन देशों के नेता या वरिष्ठ प्रतिनिधि न्यूयॉर्क पहुंचते हैं। वे अपने देश की समस्याओं, प्राथमिकताओं और दुनिया से जुड़े अहम मुद्दों पर भाषण देते हैं।

इसी प्रक्रिया को ‘जनरल डिबेट’ यानी सामान्य बहस कहा जाता है। हालांकि, यहां नेता आमने-सामने बैठकर बहस नहीं करते। हर देश को UN महासभा के मंच से अपनी बात रखने का मौका मिलता है।

इसके अलावा, इस दौरान अलग-अलग देशों के नेता दूसरे देशों के नेताओं के साथ बैठकें भी करते हैं। इनमें व्यापार, सुरक्षा, युद्ध, कूटनीति और दूसरे अहम मुद्दों पर बातचीत होती है। इसलिए UN का यह सप्ताह दुनिया की कूटनीति के लिहाज से काफी अहम होता है।

ब्राजील सबसे पहले, फिर अमेरिका की बारी

जनरल डिबेट की शुरुआत ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के भाषण से होगी। इसके बाद मेजबान देश अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प बोलेंगे।

जनरल डिबेट में सबसे पहले ब्राजील और उसके बाद अमेरिका के बोलने की परंपरा काफी पुरानी है। यह कोई लिखित नियम नहीं है।

UN के शुरुआती वर्षों में कोई भी देश सबसे पहले भाषण देने की पहल नहीं करना चाहता था। ऐसे में ब्राजील ने यह जिम्मेदारी संभाली। इसके बाद 1955 से जनरल डिबेट में ब्राजील के सबसे पहले बोलने की परंपरा बन गई।

ब्राजील के बाद अमेरिका को बोलने का मौका इसलिए मिलता है क्योंकि UN का मुख्यालय न्यूयॉर्क में है और अमेरिका मेजबान देश है।

इसके बाद कौन सा देश कब बोलेगा, यह UN तय करता है। इसमें यह देखा जाता है कि किस देश का प्रतिनिधि कौन है, पिछले साल उस देश को कब बोलने का मौका मिला था और अलग-अलग देशों को बोलने का मौका कैसे दिया जाए।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 23 सितंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भाषण दिया था।

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने 23 सितंबर 2025 को संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में भाषण दिया था।

15 मिनट की स्पीच का नियम, कास्त्रो ने 4 घंटे 29 मिनट बोला

जनरल डिबेट में एक देश के नेता को आम तौर पर 15 मिनट बोलने के लिए दिए जाते हैं। यह समय इसलिए रखा जाता है ताकि सभी देशों को अपनी बात रखने का मौका मिल सके। हालांकि, इतिहास में कई नेता इससे काफी ज्यादा देर तक बोले हैं।

सबसे लंबा भाषण क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो ने 1960 में दिया था। उन्होंने करीब 4 घंटे 29 मिनट यानी 269 मिनट तक भाषण दिया था। यह UN जनरल डिबेट में अब तक का सबसे लंबा भाषण माना जाता है।

भारत की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2014 में करीब 35 मिनट 38 सेकंड तक भाषण दिया था। उनका यह भाषण 27 सितंबर 2014 को UN जनरल डिबेट में हुआ था।

क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो 26 सितंबर 1960 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते हुए।

क्यूबा के नेता फिदेल कास्त्रो 26 सितंबर 1960 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में भाषण देते हुए।

भारत के लिए UN में 5 बड़े मुद्दे

1. आतंकवाद: भारत लंबे समय से UN में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की बात करता रहा है। भारत चाहता है कि आतंकवाद से निपटने के लिए देशों के बीच बेहतर सहयोग हो।

2. पश्चिम एशिया और भारतीयों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष भारत के लिए सीधे तौर पर अहम है। इस इलाके में बड़ी संख्या में भारतीय रहते और काम करते हैं। तनाव बढ़ने पर उनकी सुरक्षा और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित वापसी भारत के लिए बड़ा मुद्दा बन जाती है।

3. तेल और ऊर्जा की सुरक्षा: भारत अपनी जरूरत का काफी तेल दूसरे देशों से खरीदता है। पश्चिम एशिया में तनाव का असर ऊर्जा की सप्लाई पर पड़ सकता है।

4. ग्लोबल साउथ की आवाज: भारत विकासशील देशों की समस्याओं को UN में उठाता रहा है। इन देशों के लिए गरीबी, कर्ज, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा और विकास के लिए पैसा जुटाना बड़ी चुनौतियां हैं।

5. UNSC में सुधार: भारत लंबे समय से UN सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग करता रहा है। भारत का कहना है कि आज की दुनिया की स्थिति को देखते हुए UN की संस्थाओं में बदलाव होना चाहिए।

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